नीमा की भिटौली : पहाड़ की लोककथा

चेत का महीना आधा बीत गया | बसंत की खुशबू पूरी तरह से घर की क्यारियों से लेकर  गाँव के खेतो से होकर जंगल के फूलों तक फ़ैल चुकी थी | बांज पर ताजे हरे रंग के नए पत्ते ,तो बुरांश के फूल पक कर सूखने लग गये थे | गाँव के बूढ़े अखरोट और खडीक आदि  के पेड़ो पर हरे पत्ते आने से वे फिर से जवान हो गये थे |

इन्ही पेड़ो पर घुघूती जब घुर्राने लगी तो , नीमा की पापी जिकुड़ी न जाने क्यों फटने लगती | सुना है बसंत के आते ही खुशियाँ भी साथ-साथ चलती हैं | लेकिन नीमा के मायूस चेहरे को छोडकर  इन खुशियों ने सभी के चेहरे को रौनक दी है | 

जब से उसकी शादी हुई है  उसे कभी भी किसी ने बिना मायूसी के , बिना मुरझाये चेहरे के नहीं देखा | हाँ! वो हंसती तो है , लेकिन खुश रहना किसे कहते हैं ये उसे नहीं पता |

साल में जब भी चेत का महीना आता है , उसका जी और मचलने लगता है | आस-पड़ोस में देवरानी-जेठानी  की जब भी मायके से भिटोली (आळ) आती है ,  नीमा के घर के साथ-साथ गाँव के सभी घरो में भी उसे बांटा  जाता है  | घर में अरसा-रोटना, मिठाई-बताशा , पूरी आदि आते ही , नीमा के दोनों बच्चे हमेशा की तरह लड़ने लगते हैं ||  इस बार भी जब पड़ोस की भिटौली आई तो ,नीमा को हमेशा बीच में पड़ना ही पड़ा | नीमा ने दोनों को बराबर बांटकर दिया , तो बड़ी बेटी ने उससे कहा कि , ” माँ , तू अपने बेटे को हमेशा ज्यादा देती है |”

यह सुनकर छोटा बेटा खुश होता है कि उसे ज्यादा मिला है , दौड़ कर माँ  की गोद में कूद पड़ा | धूप में खेत से काम करके आई नीमा, थकान से इतना मारी थी कि हँसना चाहते हुए भी हँस न पाई | बेटा एक हाथ में बचा हुआ रोटना पकड़े हुए , माँ से दूध पिलाने की जिद करने के बाद ,माँ की गोद में दूध पीने लग गया |

हाथ में बचे हुए टुकड़े को देखकर ,नीमा की बेटी ने उसे अचानक से छीन लिया | माँ से अलग होकर ,उसके बेटे ने जब देखा कि उसका बचा हुआ रोटना उसकी दीदी ने ले लिया है , तो उसने अपना ब्रह्मास्त्र निकाल दिया | बेटे का एक मात्र लेकिन असरकार हथियार……वह रोने लग जाता है ,माँ  से जिद करने लग गया है , उसे वही रोटना चाहिए जो उसकी दीदी ने खाया है | भला उसे कौन और कैसे समझाए , कि वो टुकड़ा पहले तो अब वापस मिल नहीं सकता और यदि मिलता भी है तो वह अपने मूल रूप, मूल अस्तित्व में नहीं होगा |

बड़ी मुश्किल से नीमा ने बेटे को मनाया , अपनी बेटी को  बहुत डांटा | बेटा  चुप-चाप माँ की गोद में दूध पीते-पीते सो गया | छोटे बच्चे जितना रोते हैं , उतनी ही गहरी नींद में सो भी जाते हैं | नीमा ने अपनी बेटी को बहुत डांट-फटकार लगा दी थी , एक तरह अपनी सारी थकान उस पर उतार दी थी | नतीजतन , बेटे को सुलाने के बाद , अब उसकी बारी अपनी बेटी को मनाने की थी | जिसे उसने कुछ ज्यादा ही डांट दिया था |

“तुम बड़ी हो , तुम्हे पता है वो पूरा घर सिर में रख देता है , जब मैंने तुम दोनों को बराबर दे दिया था तो तुम्हे उसके हाथ नहीं छीनना चाहिये था | “

“पर माँ !!!……..” बेटी कुछ कहना चाहती थी कि लेकिन चुप हो गयी | थोडा रुकी ,और माँ से गहरी आवाज में उसने पूछा | “माँ ! तुम्हारे लिए क्यों कोई भिटोली नहीं भेजता |“  नीमा की बेटी आगे भी बात कर रही थी ,पूछ ही रही थी | लेकिन नीमा , इसी सवाल पर सहम सी गयी |

इस तरह के सवाल आज तक गाँव वाले ही , उसके आगे-पीछे किया करते थे |  नीमा तू कभी मायके क्यों नहीं जाती ? नीमा , तेरे मायके में कौन-कौन हैं? इस बार तेरी भिटौली तो आएगी न ? ऐसे सवालों का  जवाब पिछले कई सालों से उसकी  खामोशी ही देती आ रही थी |

आज जब यही सवाल अपनी बेटी के मुंह से सुना तो उसका सहम जाना जायज था | वह फिर चुप रही , आखिर क्या बताती ? शादी के दस साल हो गये और इन सालों में वह कभी भी अपने मायके नहीं गयी | न रन्त , न रैबार  उसे अपने मायके की कुछ खबर नहीं थी | बस अपने मायके में बिताया हर पल ही अभी याद था |

माँ के साथ घर-खेत का काम करना , छोटे भाई को संभालना , सहेलियों के साथ खेलना उसे बस यही याद था ,और ये यादें अक्सर  उसे गुदगुदाती भी थी तो आँखों को नम भी कर देती थी |

चेत,सावन और पूस का महीने में जभी भी गाँव की कोई देवरानी-जेठानी मायके जाती , या फिर व्रत-त्यौहार के लिए किसी के मायके से  कोई बुलाने आता तो उसके मन में एक टीस उभर कर आती | एक ‘काश’ आता और उसे मायूस कर देता | मल्ली खोली की जेठानी का बड़ा भाई हर साल की तरह इस साल भी आया है | उसे देखकर ,नीमा को अपने छोटे भाई की याद आई , इतने साल बीत गये हैं , “कितना  बड़ा हुआ होगा ? अब तो नौकरी-चाकरी करने लग गया होगा | नौकरी-चाकरी लग गयी है तो हो सकता है शादी भी हो गयी होगी |”

सभी की तरह , वह भी चाहती  है , मायके का सुख वो भी देखे | अब बहुत साल हो गये हैं , इसलिए ये सब बाते वो आसानी से दिल में ही दबा देती थी | जब भी कभी मायके के बारे में कोई ख़याल आता, अपने ईष्ट देवी -देवताओं से अपने मायके-परिवार के सुख और समृद्धि की कामना करती |

चेत का महीना अब पूरा होनें वाला था, गेहूं के खेत अब हरे से  धीरे-धीरे पीले होने लग गये थे | गाँव के कुछ लोगों ने तो गेहूं की कटाई शुरू भी कर दी थी | कड़ी दुपहरी में खेत से  गेहूं के पुल्ले पीठ पर ( भारे के रूप में ) लाद कर घर के आंगन लाया जाता था | जिसके बाद गेहूं की बाली की छोटी-छोटी मुट्ठियाँ बनाने के बाद उन्हें कुछ दिनों तक दूप में सुखाने के बाद काट दिया जाता था | फिर गेहूं की  बालियों को कुछ दिन और धुप में सुखाना पड़ता था | उसके बाद आँगन में  बैलों को इन बालियों के ऊपर घुमाना पड़ता, बैलों के ठोस खुर्चो से गेहूं के बीज ,बालियों से निकल जाते और बाद में , सुप्पे और हवा के मदद से गेहूं की फसल से भूसे को अलग और गेहूं को अलग करना पड़ता |

इस पूरी प्रक्रिया में बहुत समय लगता , जिसके जितने खेत होते , उसे उतना वक्त …. ऊपर से मानव संसाधन की भी इसमें काफी जरुरत होती | इसलिए यह भी देख जाता कि अक्सर लोग एक दुसरे के साथ हाथ बंटाने उनके घर भी चले जाते |

नीमा की भी कुछ खेतों की फसल पकने लग गयी थी | एक सुबह आसमान साफ़ देखकर पहले , गोबर से आंगन की अच्छी तरह से पुताई कर दी | धूप इतनी तेज थी कि दोपहर होते-होते , आंगन सूखकर तैयार हो गयी थी |

शाम होते ही, गेहुं के भारे , उसने आंगन में रख दिए | उसके बाद अपने दोनों बच्चो से इन गेहूं की मुट्ठियाँ बनाने को कहा |  जब अगली बार वह फिर गेहूँ लेकर आई तो सिर्फ उसकी बूड़ी सास गेहूं की मुट्ठियाँ बना रही थी | बड़ी मुस्किल से अपने दोनों बच्चो को मनाया , जो काम न करना पड़े इसलिए किताब खोले हुए थे | (Pahadi Folk Story)

एक पहाड़ की स्त्री का जीवन पहाड़ की तरह कठिन होता है | हर दिन , हर महीना , हर मौसम , व्यस्तता से भरा रहता है | नीमा को अभी बहुत काम करने थे ,गेहूं लाने के बाद मवेशियों के लिए घास भी लाना था | रात होने से पहले गोशाला में भैंस  दुहानी थी , फिर जाकर अगर समय हुआ तो आंगन में लाइ गयी सारे गेहूं की  मुट्ठियाँ बनानी थी ,  क्योंकि अभी कल दुबारा से खेत से और गेहूं लाने थे |

यही सब बाते दिमाग में रखकर , नीमा सारा काम पूरा कर  शाम को गोशाला से  वापस  घर आई | घर के आंगन में गेहूं के सारी मुट्ठियाँ बना दी गयी थी |  उसके दोनों बच्चे अभी भी आंगन में बैठकर , गेहूं की बची-खुची मुट्ठियाँ बनाने में लगे थे | इन  मुट्ठियों का एक बड़ा ढेर , आँगन के एक किनारे पर  सलीके से लगा  देखकर , नीमा को लगा कि ये सब शायद उसकी सास और बच्चो ने मिलकर ये  किया होगा | (Uttarakhandi folk Story )

वह जैसे ही चमकती हुई आँखों से अपने बच्चों की ओर देखने लगी और शाबाशी के कुछ शब्द कहने ही वाली थी , बच्चो के पास बैठे एक अनजान जवान लड़के को देखकर , चौंक गई| उसके दिमाग में इससे पहले कोई सवाल आते कि ये लड़का कौन है ? यहाँ क्या कर रहा है ? तभी उस जवान लड़के ने हाथ में रखी गेहूं की मुट्ठी को जमीन पर रखा और नीमा की ओर बड़ा “दीदी प्रणाम” कहते हुए उसके पैर छूने लगा |

हट्टा-कट्टा सुडोल शरीर , सिर पर एक दम छोटे बाल , सांवला चेहरा और उस चेहरे पर एक खिलखिलाती हुई मुस्कान वाले इस लड़के को अपने पैर छूते हुए देखकर नीमा के भावो को बता पाना आसान नहीं था  |

यह जवान लड़का और कोई नहीं , नीमा का छोटा भाई था | जिसे नीमा 10 सालो के बाद देख रही थी | जब नीमा यह पता चला कि उसका भाई यहाँ , उसके ससुराल उसे मिलने आया है , वह फूट-फूट कर रोने लगी | पिछले 10 साल में नीमा ने अपने ससुराल में अपने कामो में , खेत-खलिहानों में उतना पसीना नहीं बहाया , जितना वह इस समय आंसू बहा रही थी |

रोते-रोते अपने भाई से कह रही थी , कि इतने साल कहाँ था ? तुम लोगों ने मेरी सुध भी नहीं ली ? तुम मुझे भूल गये थे ? भाई कुछ बोल नहीं रहा था ,नहीं वो रो रहा था , हाँ कुछ आंसू कैसे उसके आँखों से अपने आप बह रहे थे ,इस बात की उसे कोई खबर नहीं थी | बस दीदी के सिर पर हाथ फेर रहा था |

आँखों के सारे आंसू सूख चुके थे , नीमा का गला रो-रो कर पूरा बैठ चूका था | बस रोने के बाद की हिचकियाँ ले रही थी | जब भी भाई पर  वह देखती , रोना आता लेकिन आँखों से आंसू निकलते नहीं , गले से आवाज आती नहीं | अपनी धोती का एक पल्ला मुंह पर लगाती  और कभी जमीन और तभी उपर देखने लगती |

रोने धोने के चक्कर में रात भी अब बहुत हो चुकी थी | नीमा ने रात का खाना बनाया | उसके दोनों बच्चे और उनके मामा साथ में खाना खाने के लिए बैठे | थाली में नीमा में कोदे की गर्म-गर्म रोटियों पर घी लगा कर रखा था |  एक कटोरी में तुअर की दाल , उसी के बगल में हरी सब्जी | अपने भाई के लिए ख़ास कर खीर भी बना रखी थी |

नीमा , खाना परोसते-परोसते अपने भाई से बहुत बातें कर रही थी | बातो के चक्कर में वह एक भी रोटी पूरी नहीं खा सका | नीमा जानना चाहती थी , मायके में माँ कैसी है , गाँव में लोग कैसे हैं , खेती-बाड़ी क्या है ? वह वो सब पूछ रही थी जो वह इन 10 सालों में नहीं पूछ सकी | इतने सारे सवालो का जवाब एक साथ देना इतना आसान भी नहीं था |

उसने एक दम से फिर कहा “दीदी!!  मायके पहुँचोगी तो  तुम्हे खुद पता चल जाएगा | खुद ही देख लेना | मैं तुम्हे मायके बुलाने आ रखा हूँ | इस बिखोती को शादी है मेरी | “ यह सुनकर नीमा चौंकते हुए खुश हुई |

 नीमा के भाई ने फिर बताया कि उसे फ़ौज में भर्ती हुए उसे 5 साल हो गये हैं , उसने कई बार सोचा कि वह दीदी से मिलने आये | लेकिन घर-गाँव में हालात कभी ठीक ही नहीं थे | जब भी छुट्टियों में घर आता , कुछ न कुछ जरुरी काम पड़ जाता था | ऊपर से माँ की तबियत भी ठीक नहीं रहती | माँ के बुढ़ापे को बीमारियों का बहाना लगने लगा था |  इस बीच थोडा सही हुई तो खुद कहीं से उसकी शादी के लिए लडकी ढूंढ भी ली |

सालो से नीमा चेत, पूस के महीने बस इसी बात का इन्तेजार करती थी कि इस बार उसके मायके से उसके लिए आळ या भिटौली आएगी | यह उसकी आशा मात्र ही रह जाती थी | इस बार उसका भाई न सिर्फ उसके के लिए  चेत के महीने का कल्यो लेकर आया था , बल्कि मायके बुलाने भी  आया था |

ससुराल में धाण (काम-काज) इन दिनों बड़ने के बावजूद , नीमा ने कोई परवाह नहीं की | मायके जाने से पहले , गोशाला में घास की पर्याप्त व्यवस्था कर ली थी  | मवेशियों को पानी पिलाना और नहलाने  जैस छोटे मोटे काम उसकी सास कर सकती थी | बस पड़ोस की जेठानी को दूध दुहाने के लिए कह दिया था | बाकी बचा गेहूं कटाई का काम , वह उसने बाद के लिए छोड़ दिया |

सुबह होते ही गाँव से कुछ दूर सडक पर बने प्रतीक्षालय में नीमा, उसके बच्चे और ऊसका भाई गाड़ी का इन्तेजार करने लगे | बच्चे खुश थे , उत्सुक थे , आखिर पहली बार नानी के घर जा रहे थे, | स्कूल में अब वे भी अपनी नानी की कहानियां , मामा के किस्से सुना सकती थी | जैसे ही गाडी आई , नीमा हरी साड़ी में बसंत ऋतु की तरह खुश दिखाई देने लगे |

नीमा न जाने कितने सालो बाद आज सुन्दर और खुश दोनों लग रही थी | इस चेत के महीने के खत्म होते होते नीमा और नीमा की हरी साड़ी , गले का गुलबन्द , कलाई की लाल चूड़ियाँ , पावों की पायल आदि का इन्तेजार भी खत्म हुआ |
…………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………….(जारी )

भिटौली से जुड़े कुमाऊनी लोकगीत – Kumaoni Folk Song related Bhitauli (kafaltree.com)

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