कोरोना बनाम 10/10 का कमरा

 रात के अँधेरे में जब दुनिया सो जाती है,जब टीवी पर चल रहे चैनल शांत हो जाते हैं,जब दूर कहीं किसी बिल्डिंग की चकाचौंध रौशनी मंद पड़ जाती है, तो 10/10 के कमरे में छात्रों का एक अलग सा शोर होता है,

10/10  किराए के कमरे वे भट्टियाँ हैं जिनमें कुछ छात्र तपकर सोना बन जाते हैं,तो कुछ   जलकर राख बन जाते हैं।वो 10/10 का कमरा एक स्वर्णिम पहलू होता है इन छात्रों के जीवन का।

वो उम्मीद रखते हैं तो बस इसी से,वो विश्वास रखते हैं तो बस इसी में बस इसी में।

 

आज कोरोना महामारी के कारण पटना,प्रयागराज,दिल्ली,कानपुर जैसे तमाम बड़े शहरों के साथ देश के कई छोटे शहरों  में रहने वाले छात्रों को, जो  अपने सपनों के लिए संघर्ष करते रहते हैं,  सरकारी नौकरी, कालेज की परीक्षा के साथ-साथ अपने 10/10 किराये के कमरे की भी चिंता है। कोरोना महामारी की वजह से छात्रों को ये 10/10 के कमरे खाली करने पड़ रहे हैं।

ये सच है कि छात्र देश का भी भविष्य होते हैं,और जब उन्हीं छात्रों का भविष्य किसी विसुवत रेखा पर लंबवत खड़ा हो तो एक सवाल बनता है ना साहब।

सवाल ये की इन छात्रों के किराये का क्या होगा जो पिछले 3-4 महीने से क्वारनटाइन हैं इस उम्मीद से कि  उस बड़े से मकान ,जिसमें उनका 10/10 का कमरा है, के अक्सर हँसकर बात करने वाले अंकल और आंटी, एक बड़ा सा दिल रखते होंगे,पर अफ़सोस की उस बड़े से शहर के बड़े से घर की मकान  मालकिन एक बहुत ही छोटा ह्रदय रखती हैं स्वार्थ की भावना के साथ।

आए दिन हर महीने की पहली तारीख को छात्रों से ये कहा जाता है,कि या तो आप किराया दे दें या फिर कमरा खाली कर दें।

हर विद्यार्थी परजीवी होता है,वो जिन्दगी के हर मोड़ पर किसी दूसरे पर ही आश्रित होता है-पैसों के लिए घरवालों पर,छत के लिए किराये के मकान पर और सफलता के लिए कोचिंग संस्थानों पर,

यह घर से बाहर पढ़ रहे हर एक विद्यार्थी के जीवन का कटु सत्य है। लेकिन  इस कटु सत्य की सत्यता को समझने के लिए शायद ही कोई होगा।

 कुछ विद्यार्थी तो अपनी सफलताओं और असफलताओं को अपने 10/10 के किराये के कमरे में ताला मार कर घर चलें गये हैं और कुछ वो जो  उन्हीं किराये के कमरों में रहकर अभी भी संघर्ष कर रहे हैं। जिनके कमरों पर ताला लगा हुआ है ,उन्हें आजकल मकान-मालिक/मालकिन के बहुत पूछ रहें हैं, इधर-उधर की बातें किराये पर अटक रही हैं। ये उम्मीद लगाए बैठे हुए हैं कि शायद बड़े घर की मकान मालकिन उनका किराया माफ़ कर दे, लेकिन कुछ  मकान मालिक/मालकिन मजबूर हैं,और कुछ इस मजबूरी का फ़ायदा उठाने को भी बेताब हैं।

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ये भी कटु सत्य है कि जितने भी  छात्र गावं से शहर यूपीएससी या अन्य परीक्षाओं की तैयारी करने आते हैं उनमें से अधिकतर छात्र निम्न वर्ग से तालुक्क रखते हैं, ऐसी स्थिति में जब उनकी आगामी परीक्षा लगातार अस्थाई रूप लगातार स्थगित हो रही है, तब उनके बेरोजगार हुए  अभिभावक कर्जदार बनते जा रहे हैं………

छात्रों से किराया मांगना मकान मालिक/मालिकिन के लिये जरूरी है और इस वक्त छात्रों को किराया देना मजबूरी ।

ऐसा ही याफ आगे भी कुछ समय और चलता रहा तो कोरोना बनाम छात्रों के 10/10 किराये के कमरे के बीच इस मुकाबले में कोरोना आसानी से बाजी मार देगा।

 अमन जग्गी 

बचपन की यादें

 

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