पहाड़ के काम की जवानी : बिट्टू की कहानी

पहाड़ का जीवन पहाड़ की ही तरह बड़ा कठिन होता है | जब भी कोई दिल्ली-मुंबई से पहाड़ घूमने आता है तो इस बात का अंदाजा उन्हें पहाड़ की सडको पर धक्के खाते हुए हो जाता है | इन कच्ची ,पथरीली और संकरी सडको पर गाडी चला पाना जहाँ नए और बाहर के ड्राईवरों के लिए बिलकुल भी आसान नहीं होता है | वहीँ दूसरी ओर कुछ ड्राईवर ऐसे हैं , जो इन सडको पर गाडी चलाते हुए नहीं , उड़ाते हुए देखे जाते हैं |

इसीलिए तो पीछे की सीट पर धक्का खा रहे कुछ लोग , इन्हें पायलट साब करके संबोधित करते हैं |

 दांतों से दिलबाग की पुड़िया फाड़ते ही बिना जर्दे के दिलबाग को मुंह में डालते हैं और  इसी दौरान गाडी का गियर उठाते हैं | गाडी को पार्किंग से आगे निकालकर थोड़ी दूर पर दिलबाग के गाड़े लाल रंग के थूक को बाहर फेंकते ही , गाडी की  उड़ान भर देते हैं |

जो बीड़ी को सुलगा कर गाड़ी को उठाते हैं , इस दुनिया में उनकी बिरादरी दूसरी है , उनकी बात कभी किसी और दिन |

आज बात बिट्टू भाई की जो पिछले 8-10 सालो से मैक्स चलाता है, नहीं!! माफ़ी चाहता हूँ , मैक्स.. उड़ाता हैं | पहाड़ की उन सडको पर जिनमे न गड्ढो का पता चलता है और न ही मोड़ो का, न ऊपर से गिरने वाले कंकड़-पत्थरों का पता चलता है और न ही नीचे के पुश्तों के ढह जाने का |

इन गड्ढो के ऊपर , मोड़ो से होकर , कंकड़-पत्थरो को ध्यान में रखकर और बरसाती पुश्तों से बचकर , कैसे गाडी को सडको पर चलाया, नहीं! बल्कि , हवा बनाया जाता है , यह बिट्टू का रग-रग जानता है |   

बिट्टू यूँ तो एक मैक्स ड्राईवर है , लेकिन आम मैक्स ड्राईवर वाले कोई ख़ास गुण उसमे हैं नहीं | जवानी उसके चमकते चेहरे पर साफ़ अपनी उम्र बताती है , न दिलबाग खाते हुए कभी दिखाई दिए हैं और न ही पीने से जुड़े किसी किस्से को सुनाते हुए देखा गया है| शायद इसीलिए गाँव में सबके विश्वसनीय और चहीते हैं | गाँव की बारात में गाँव के सारे घुपरोलो का घपरोल इन्ही की गाडी में होता है | गाँव के छोरों की पहली पसंद ये होते हैं , जो उन्हें छत में बिठाने के लिए आसानी से मान जाते हैं | छोरों के कहने पर बारात में जाते हुए , मोड़ो पर कम और सडक के किनारे आती-जाती लडकियों को देखकर हॉर्न बजाने में वह भी  खूब मजे लेता है |

आज बिट्टू , एक मैक्स के साथ एक छोटी कार और ट्रेवलर भी है | अपने साथ-साथ दो और लोगो को भी उन्होंने रोजी नहीं बल्कि एक नया जीवन दिया है | कार अक्सर शादी ब्याह की छोटी मोटी बुकिंग लेती है और ट्रेवलर यात्रा सीजन पर ही रहती है |

एक समय था जब घर के हालात बिलकुल भी अच्छे नहीं थे | 2 बहिने और 2 भाई में उसका रोल नम्बर 4 था | दसवीं की बोर्ड परीक्षा के बाद ही वह पंजाब भाग गया था | वहां होटलों में बर्तन धोने से लेकर कंपनियों में सामान ढोने तक के सारे काम करके इधर-उधर की ठोकरे खता रहा | वहीँ रहकर गाडी चलाना भी सीख लिया और एक साहब के घर ड्राईवरी भी की |

फिर कुछ सालो बाद जिस उम्र में अक्सर गाँव की  जवानी शहर जाती है , बिट्टू उस जवानी के साथ एक सबक लेकर घर-गाँव लौट आया | सबक , घर से दूर जाने , घर वालो को खुद से दूर रखने का | अब तक दोनों बहिनों की शादी हो चुकी थी , और बड़ा भाई शहर में एक अच्छी नौकरी करने लग गया था|

घर में कोई कमाने वाला नहीं था , इसलिए वह ज्यादा दिनों तक घर में मुफ्त की रोटियां नहीं तोड़ सका | पिता जी की उम्र हो रही थी , इसलिए उनकी जगह , बिट्टू ने  चाय-नाश्ते की दूकान में बैठना शुरू कर दिया | जहाँ पर चाय के बहाने कुछ लोग, अखबार की खबरों के आधार पर देश-दुनिया को बदलने की बाते करते तो कुछ ताश के पत्तो के साथ अपनी किस्मत आजमाते हुए चार लोगो का मनोरंजन का खेल खेलते |

बिट्टू का मन इस काम से जल्द ही ऊब गया | कुछ महीनो तक यूँ ही चाय में चायपत्ती मारता रहा | फिर एक दिन चार लोगो  के  ताश के पत्तो के खेल में , पांचवे आदमी बिट्टू की किस्मत का पत्ता निकल गया | जब  पड़ोस के गाँव के ठेकेदार ने उसे अपनी गाड़ी चलाने के लिए पूछा |

इससे पहले और ड्राइवरों ने उनकी गाडी चलाना छोड़ दिया था| इसलिए लोगो ने जब यह सुना तो कईयों ने बिट्टू को  मना करना भी चाहा | लेकिन अभी बिट्टू की जिन्दगी में भटकना जरुरी था , जीना है तो हर जगह हाथ मारना जरुरी था |

इस तरह ड्राईवरों की इस बिरादरी में एक नये ड्राईवर का जन्म हुआ |  इस नए सदस्य का सभी ने अपने-अपने अंदाज में स्वागत किया, कुछ ने अपने सुझावों के तले उसे दबाकर रखा तो कुछ ने अपनी शिकायतों के जरिये उस पर मानसिक दबाव डालने की कोशिश की | कई बार उसे लोगों ने अपने एहसानों के तले कुचलना भी चाहा तो कई बार कर्ज के जाल में उसे फ़साने का भी प्रयास होता रहा |

इसके विपरीत कुछ ऐसे भी साथी रहे , जिन्होंने उसे इन तमाम चुनौतियों और समस्याओ का सामना करने के लिए उसे समय-समय तैयार भी किया |

बिट्टू  सुबह तैयार हो कर ,अपने सभी जरुरी कागजो का थैला , अपने बगल में दबाकर सडक पर पहुँच जाता | अपनी गाडी ,जिसपर उसका मालिकाना हक़ नहीं था , उसे दुल्हन की तरह सजा कर रखता था | सुबह सडक पर आते ही , गाड़ी की अंदर से सफाई करता , मालिक से कहकर जो सीटों के नए कवर चड़ाए थे , उन्हें कपडे से झाड़ता | शीशो को साफ करता , और गाड़ी अपने नम्बर पर लगाने से पहले एक धूप-अगरबत्ती जला के रखता |

सुबह सवारियों को बाजार पहुंचाता और शाम को सवारियो के साथ उनका भारी सामान भी वापस लाता | यह सिलसिला पिछले कई  सालों तक यूँ ही चलता रहा | अपनी सारी जिन्दगी  के साथ अपनी रोज की दिनचर्या को अपने इसी काम के इर्द-गिर्द रखा |

इस बीच  एक ओर जब वह इस पेशे में अपने पैर जमा रहा था ,तो दुसरी ओर उसकी जिन्दगी में किसी को लाने की आहटें भी तेज हो गयी | वह हर वक्त अपने घर में नहीं हो सकता था, इसलिए  घर में घरवालो का ख़याल रखने के लिए घरवाली की जरुरत का एहसास उसे भी जल्द हो गया |

 बिट्टू  की शादी के डेढ़-एक साल में एक छोटी बिटिया भी हुई और उसकी बिटिया जब दो साल की हुई तो , उसके जीवन में वह दिन भी आ ही गया जब उसने अपनी बिटिया का नाम , खुद की नई गाडी पर सजाया |

   “अंशिका के पापा की गड्डी !”

बिट्टू ने  इस काम को पर्याप्त समय और ऊर्जा दी | इसी का परिणाम है , आज बिट्टू ने अपने काम की वजह से एक नाम कमाया है |

और यह नाम आज  हर जगह इस्तेमाल होता है , बारात में जाते वक्त जवान लड़को की जबान से लेकर , गाँव के छोटे से बाजार, जो आस-पास रहने वालो लोगो की जरूरतों को पूरा करता है , उस बाजार की दुकानों की जरुरत पूरी करने तक में उसका नाम सबसे पहले लिया जाता है |

खाज्जा-बुखना से लेकर घ्युं की माणी तक गाँव की समलौण  शहर के ठीक ठिकाने तक पहुचाने में यह नाम विश्वसनीय है | लोग बिट्टू की गाड़ी को देखकर ही , उसके गाड़ी के डेस्कबोर्ड में शादी के कार्ड रख लेते हैं, जिन्हें बिट्टू देना भूल जाता है लेकिन ठीक समय पर ठीक लोगों तक भी पहुंचा देता है |

जो काम सरकार नहीं कर पाई , बिट्टू  हर दिवाली-होली और गर्मियों की छुट्टियों में वह काम करता है | दिल्ली,देहरादून, हरिद्वार  के शहरी लोगों को वापस घर लाकर वह रिवर्स पलायन भी करता है | हाँ बात अलग है , इन लोगो को शहर भी सबसे पहले यही ले गया था |

सुबह बाजार जाते वक्त 10 सवारी और वापस आते वक्त 14-16 सवारी घर ले जाने में वह भी अब माहिर हो गया है|

बिट्टू जैसे ड्राइवरों की एक ख़ास बात है | सवारी जब आपस में बात कर रहे होते हैं, तो उनकी बातो से जुड़ा किस्सा सुनाने में वह कभी पीछे नहीं रहता| साथ ही अपने किस्सों की शुरुआत , उन जगहों के नामो से जरुर करता , जिनका जिक्र पीछे बैठे सवारियों ने अपने बातो में किया था |

इसके आलावा और गाड़ियों की तरह बिट्टू की गाडी के सीटों के नीचे भी स्पीकर लगे हैं | 

जहाँ ड्राइवरों के एक बड़े वर्ग की गाड़ियों में गढ़वाली-कुमाउनी के वे गीत चल रहे होते हैं  जो रिलीज़ होने के ठीक बाद और  शादियों में बजने से पहले प्रचलन में रहते हैं | साथ ही इसके आलावा दारू और टूटे हुए दिल से जुड़े हुए गीत भी अक्सर इनकी सीट के नीचे लगे स्पीकर पर बजते रहते हैं |

“मैं दारू नि पीणया , मिन सौं खेलिनि…. “  “तेरा गम मा गयी अंजली मैं दर्व्यालू व्हेग्ये …”

वहीँ बिट्टू की गाडी में गीत तो ज्यादातर कुमाउनी-गढ़वाली ही बजते हैं | लेकिन उनमें  नेगी दा की “भनुली” , प्रीतम दिदा की “बिंदुली” और आजकल लेटेस्ट कुमाउनी गीत “हिमुली” जैसे गाने ज्यादा बजते हैं ,जिनका संगीत सवारियों के लम्बे सफर को सरल बना देता है |

बिट्टू जैसे ड्राइवरों की जिन्दगी बस सडक के मोड़ो और सवारियों तक ही सीमित नहीं होती | अपने काम  के आलावा वे अपना शौक भी पूरा करते हैं , वो शौक जिसके साथ वक्त गुजारने के लिए हमेशा वक्त की कमी महसूस होती रहती है |

सर्दियों में जब खेतो में क्रिकेट टूर्नामेंट आयोजित किये जाते हैं | तो बिट्टू की एक टीम हर जगह रहती है , शुरूआती मैचों में वह कप्तान की भूमिका निभाता है लेकिन सेमीफाइनल-फाइनल आते-आते वह टीम का स्पोंसर बन जाता है | जिसे बस जीत से मतलब रहता है |

बिट्टू इतने पैसे पूरे साल-भर में खर्च नहीं करता , जितना इन डेढ़-दो महीनो के क्रिकेट सीजन में | इसलिए तो बिट्टू के घर के बैठक में इतनी सारी ‘विजेता-उपविजेता’ नाम  की ट्रॉफीयां  सजी हुई हैं | और फेसबुक-इन्स्टाग्राम पर इन ट्रॉफी के  साथ फोटोज भी अपलोड होती रहती हैं| कभी ट्रॉफी को बीच में रखकर , ग्रुप फोटो तो कभी ट्रॉफी को चुमते हुए सिंगल फोटो | इन फोटो को अपलोड करते समय कैप्शन में एक बड़िया सी  शायरी  भी बिट्टू लिखना नहीं भूलता | #Champions

सोशल मीडिया के जरिये बिट्टू लोगो के साथ अपनी सामाजिक सक्रियता बनाये रखता है | अपनी दुल्हन की तरह सजी हुई मैक्स की फोटो और  ‘कल देहरादून जाने वाले सवारी सम्पर्क करे’ यह स्टैट्स हफ्ते में एक बार Whatsapp और Facebook पर पड़ता रहता है |  

बिट्टू आज पहाड़ के गाँव के लोगों को शहर के जीवन से जोड़ने का काम करते-करते, एक सफल व्यक्ति बन गया है | अक्सर ड्राईवरी के इस पेशे को संदेह की नजरो से देखा जाता है | कोई भी नहीं चाहता कि उनके करीबी इस पेशे में जाय , एक तो जान का डर और उसके ऊपर बुरी संगत  के असर का खतरा हमेशा घरवालो को सताता रहता है| लेकिन बिट्टू जैसे लोग भी हैं जिन्होंने इस पेशे को रोजगार के नए और बेहतर अवसर के रूप में एक अलग पहचान दी है | और समाज को बताया है कि वास्तव में  कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता , उस काम को करना का तरीका और सलीका उसके मायने तय करता है | अपने काम के प्रति प्यार की भावना होनी चाहिए | आप अपने काम को किस नजरिये से देखते हैं ,बाद में दुनिया भी आप के ही चश्मे से आपको देखने लगती है | इसलिए अपने काम और काम करने के तरीके से प्यार होना बहुत जरुरी होता है | 

पहाड़ में ऐसी कई जवानियों की कहानियां हैं , जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पहाड़ के काम आ रही हैं |

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पूरा पढने के लिए धन्यवाद |

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4 thoughts on “पहाड़ के काम की जवानी : बिट्टू की कहानी”

  1. मुझे लगता है जग्गी जी,भविष्य में सफलता के लिए रचनात्मकता बेहद जरुरी है, आपने पहाड़ की जवानी, बिट्टू की कहानी। ज्ञान के आधार पर किया गया नया वर्णन जिसमें कि आपके खुद के विचार।और देखने में भी एक नई रचना का उतपन्न होने का भाव उत्पन्न हुआ हैं आपकी साहित्य, सृजनात्मकता व संगीतमय जो कि (?मैं दारू नि पीणया , मिन सौं खेलिनि…. “ “तेरा गम मा गयी अंजली मैं दर्व्यालू व्हेग्ये? ) गड़वाली मातृभाषा से भी परिपूर्ण है, जग्गी जी आपकी लेखनी कल्पना वर्णन कला को बारंबार नमन ??? हमारी ओर से अनंत अनंत शुभकामनाएं बहुत-बहुत साधुवाद ???

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